लाख रहे शहरों में फिर भी अंदर से देहाती हूँ दिल भी थोड़ा बच्चा है औ' थोड़ा जज्बाती हूँ।
.. गोपाल कृष्ण शुक्ल
वक्त करता हर बार कुछ फैसले वक्त को हर बार देखा जाएगा।
जमाने में खुद को बिखरने मत दो यादें खलल डालती ही हैं सुकून में।
शब्द ढूँढता रहा मुझे शिल्प के लिए मैं स्वप्न में डूब कल्पनाएं बांधता रहा।
ज़िंदगी में कुछ तो मिला चन्द उलझने ही सही कोई न जान पाया कि ज़िन्दगी के परे क्या है॥