Sunday, January 8, 2023

{९९८}



रोम-रोम केसर घुली, चन्दन महके अँग 
अब काहे की देर पिया, मोहे भर ले अँग । 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल



हँसी की आड़ में जो छुपा के रखे थे
वो दर्द आँसुओं सँग सामने आ गए। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 



इश्क में ही जी रहे, इश्क में ही मर रहे 
आशिकी में आखिर और होता क्या है। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल



इस दुनिया में इंसान बहुत हैं 
अक्षत कम भगवान बहुत हैं 
हर तरफ मुखौटे का चलन है 
तुम झूठ कहो, ईनाम बहुत हैं।। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 



बंजर सी हो गई है अब ईमान की जमीं 
आदमी में अब आदमीयत बची ही नहीं। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल


Saturday, January 7, 2023

{९९७}




हर कोई जख्मों की सौगात दे कर गया 
राहे-उलफ़त का कोई हमसफ़र न बना। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 



उम्मीदों का ये ख्वाब सुनहरा देखें 
उसकी आँखों में अपना चेहरा देंखें 
रुख उनका गैरों की ही जानिब क्यों 
कभी वो  इश्क  हमारा  गहरा देखें। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल


 

होंठों पर हैं चुप्पियाँ, आँखों में बरसात 
तरसूँ मैं पिय मिलन को, रोऊँ सारी रात।। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 



कोई नहीं कर सकता दूर किसी की तनहाई 
हैं सूरज, चाँद, तारे, मगर तनहा आसमान है। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल



खंजरों से लिखी जा रही वफ़ा की इबारतें 
मोहब्बत में फ़ना होने का चलन अब नहीं। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

{९९६}




सियाही से इरादों की तस्वीर क्यों हो बनाते 
अपने खूँ से तस्वीर बनाओ तो असल होगी। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल



तेरा दिल यूँ सँभाल कर रखा है 
जैसे खजाना सँभाल कर रखा है। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 



फूल के बाद रोज नए-नए फूल खिलें 
दुआ है कभी खाली न हो दामन तेरा। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल



मैं जाने कहाँ रख के उन्हे भूल गया हूँ 
वो लम्हे जो हंस कर बिताने के लिए थे। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल



शजर दर शजर सिर्फ धोखा है ठण्डी छाँव का 
हासिल मुकाम सहरा के तपते सफ़र से ही है। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Friday, January 6, 2023

{९९५}



हर तरफ फैला हुआ है ऐसा काला साया 
कि अब अपने साये से भी डर लगने लगा। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 



मुसाफिर ही मुसाफिर हैं हर तरफ 
मगर हर शख्स तनहा जा रहा है। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 



लग जायेंगी अभी कई और सदियाँ 
इस दौर के इंसा को इंसा बनाने में। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल



कभी लाता नहीं ज़बाँ पर हालात का शिकवा 
बस खुद को सुपुर्दे-ग़म कर दिया करता हूँ। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल



बहुत  संगसार है  रास्ता  मेरे घर का  मानता  हूँ 
रख दूँगा हथेली पाँव के नीचे तुम आओ तो सही।

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

{९९४}



कुर्बानियाँ हमारी सब हैं भुला बैठे 
जुबां पे सबकी हमारी शैतानियाँ हैं। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 




हुस्न भी है उनका कातिल और अदा भी है कातिल 
हुस्न में शोख अदा भरकर वो खुद से झिझक रहे हैं। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 



ज़िन्दगी में जाने कैसा ठहराव आया 
कि खामोशियाँ भी दर्द से चीखती हैं। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 



अश्कों से जख्मों को धोकर आँखें ढूँढ़ती हैं 
ज़िन्दगी में क्या पाया है और क्या खोया है। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 



इश्क के महमहाते गुलशन को बेजार न कर
अपने ही नाखूनों से नया ज़ख्म तैयार न कर। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल

Wednesday, January 4, 2023

{९९३}



कभी आओ तो तुमको मैं दिखला दूँ 
मैंने किस शौक से अपने ग़म पाले हैं। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 




खुशियाँ कम  और  अरमान बहुत हैं 
गायब हो गयी हँसी, परेशान बहुत हैं 
सँभालों साहिल पे बने  रेत के महल 
समंदरों में उफनाते तूफ़ान बहुत हैं। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 




सुनो  जमाने  के  लोगों ये मेरे  दिल की आवाज है 
मोहब्बत छूट नहीं सकती, मेरा है वो मैं उसका हूँ।

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल  




कब तक देखेंगे हम ऐसे वहशी मंजर 
न इंसान बचे न इंसानियत बची कहीं। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Tuesday, January 3, 2023

{९९२}




मेरी तनहाइयों को क्या सहलाएंगें 
जब हो गए परायों से अपने लोग। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 




तनहा हूँ मैं, तनहा हैं राहें भी, साथ तनहाइयों से रहा अपना 
खो गया इस कदर जमाने में, पूछता रहा सबसे पता अपना। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 




जीस्त  की आह  में, मौत  की  पनाह  में 
जुर्म चमन पर हुए, बागबाँ की निगाह में। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 




श्रद्धा और विश्वास तुम जतलाओगे कैसे 
सजदे में गर सर को झुकाना नहीं आता। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 




ख्वाब कभी लगते हैं परिंदों की मानिन्द 
यही ख्वाब कभी-कभी सैय्याद लगते हैं। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल