पल्लव
Friday, April 12, 2013
{ ५२४ } {April 2013}
भटके पहचानी राहों में.. जाने किस कारण
आशाओं के पथ पर..... टूट गये अपने प्रण
सुधि और स्वयं का.... बिम्ब हुआ विस्मृत
दर्पण पे चित्रित हुआ नयनों का आकर्षण।।
-- गोपाल कृष्ण शुक्ल
{ ५२३ } {April 2013}
आह ! तुम्हारी मस्ताना कातिल अदायें
हुस्न की लहलहाती हुई रंगीन फ़िज़ायें
छू-छू के आती हैं जो तुम्हारे जिस्म को
दिल को बेकाबू कर जाती है वो हवायें।।
-- गोपाल कृष्ण शुक्ल
Monday, April 8, 2013
{ ५२२ } {April 2013}
रात महुए के फ़ूल छलके तो
डगमगा गई नशे में पुरवाई
पी गई इतनी कि भोर तक
चाँदनी फ़िर न होश में आयी।।
-- गोपाल कृष्ण शुक्ल
{ ५२१ } {April 2013}
प्यार का इंकलाब लिखता हूँ
कल्पना का गुलाब लिखता हूँ
बैठ कर किसी अँधेरे कोने में
रोशनी की किताब लिखता हूँ।।
-- गोपाल कृष्ण शुक्ल
Sunday, April 7, 2013
{ ५२०} {April 2013}
प्यास ही प्यास है जमाने में
एक बदली कहाँ-कहाँ बरसे
कोई बेवजह उसे छलकाये
कोई दो घूँट के लिये तरसे।।
-- गोपाल कृष्ण शुक्ल
{ ५१९ } {April 2013}
दर्द काँटों ने जो दिया मुझको
फ़ूल ने हर लिया शराफ़त से
कोई मुश्किल यहाँ नही ऐसी
जो न हल होए मोहब्बत से।।
-- गोपाल कृष्ण शुक्ल
{ ५१८ } {April 2013}
चाँदनी रात उसपे कातिल तनहाई
किस कदर तल्ख है मेरा एहसास
कौन खामोश साज को छेड गया
सारा माहौल हो गया उदास उदास।।
-- गोपाल कृष्ण शुक्ल
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