पल्लव
Friday, January 31, 2014
{ ७२३ } {Jan 2014}
शाम ढ़ल चुकी है शाम को सँवारा जाये
गम-ए-जीस्त को जाम में उतारा जाये।
-- गोपाल कृष्ण शुक्ल
{ ७२२ } {Jan 2014}
मेरे तड़पने का तमाशा देखने को
दिल को दिये उसने ज़ख्म कई-कई।
-- गोपाल कृष्ण शुक्ल
{ ७२१ } {Jan 2014}
कामनाओं का मचा हुआ उत्पात आँखों में
जल रही एक आग सी दिन रात आँखों में
बोझल हो चुके जुदाई के हर पल, हर दिन
राह तकते गुजर जाती हर रात आँखों में।।
-- गोपाल कृष्ण शुक्ल
{ ७२० } {Jan 2014}
अश्कों के खजाने यूँ ही नहीं हासिल होते
पीना पड़ता है जहरे-जुल्म काफ़ी मुद्दत तक।
-- गोपाल कृष्ण शुक्ल
{ ७१९ } {Jan 2014}
इन्द्रधनुषी.. शबाब. के. दिन. हैं
महकते. सुर्ख. गुलाब के दिन हैं
मुस्कुराओ कि हसीन है मौसम
मैकदा, साकी-शराब के दिन हैं।।
-- गोपाल कृष्ण शुक्ल
{ ७१८ } {Jan 2014}
किसी की नजरों में न रह सका
किसी ने नहीं अपनाया मुझको
मेरी कविता ने भी कहा मुझसे
किसके खातिर लिखा मुझको।।
-- गोपाल कृष्ण शुक्ल
Sunday, December 29, 2013
{ ७१७ } {Dec 2013}
गम में हरगिज न आँसू बहाया करो
वक्त कीमती है यूँ ही न जाया करो
ये दुनिया है यहाँ कोई नहीं किसी का
प्यार के गीत गाओ मुस्कुराया करो।।
-- गोपाल कृष्ण शुक्ल
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