Saturday, August 17, 2013

{ ६६२ } {Aug 2013}





उठो जवानों हर-हर कह झँझा बन सोए पौरुष का ज्वालामुखी जगाओ
बन कर महाकाल विकराल बवन्डर, पापी दुश्मन देश में आग लगाओ
उठो दीवानों अब न करो देर हुँकार भरो, बढ़ कर दुश्मन का सँहार करो
मानवता के इन हत्यारों का वध कर धरती पर नरमुँडों का ढेर लगाओ।।

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल

{ ६६१ } {Aug 2013}





देश की आबो-हवा में घुल गई नापाक बारूदी गँध किस कदर
बुजदिल हुई राजसत्ता, जन-जन का खौलता खून का सागर
दोस्त के भेष में दुश्मन सजा रहा रोज ही अदब की महफ़िले
हम बन के अमन के पुजारी बस रोज उड़ा रहे सफ़ेद कबूतर।।

-- गोपाल कॄष्ण शुक्ल

{ ६६० } {Aug 2013}





तेरी तिश्नगी पर कुछ तू भी तो गौर कर
क्या तमाम ज़िन्दगी ऐसे ही जिये जाऊँ मैं।

-- गोपाल कॄष्ण शुक्ल

{ ६५९ } {Aug 2013}





जब बसन्त ही पौधे चर जाये तब कैसे पुष्प खिलें
भरी दुपहरी ढ़ल जाये सूरज, तब साँझ कहाँ मिले
सूखे-भूखे खेत छाती फ़ाड़-फ़ाड़ चिल्लाते रह जाते
कुएँ जहाँ खुद ही हों प्यासे, वहाँ पानी कहाँ मिले।।

-- गोपाल कॄष्ण शुक्ल

Friday, August 16, 2013

{ ६५८ } {Aug 2013}





दोस्ती हरदम दोस्तों की मददगार होती है
ज़िन्दगी, दोस्ती.. की. तलबगार.. होती है
संगरेज़ी. रहगुज़र पर बिछाती जाती फ़ूल
दोस्त. की दोस्ती. इतनी. वफ़ादार होती है।।

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल

{ ६५७ } {Aug 2013}





जमीं पर उतरा है चाँद, खिली चाँदनी है
महक उठा जर्रा-जर्रा कितनी मोहिनी है
चट्टानें भी जिसे सुन कर झूम-झूम उठें
झरनों की सदा सी वो मधुर रगिनी है।।

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल

{ ६५६ } {Aug 2013}





तुम क्या हमसे रूठ गये कि अब
अपना साया भी अजनबी हो गया।

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल