Thursday, August 22, 2013

{ ६६९ } {Aug 2013}




यूँ तो मेरे हाथों में लकीरें बहुत है पर
ज़िन्दगी में गर्दिश भी कुछ कम नहीं।

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल

{ ६६८ } {Aug 2013}





दूषित दशा-दिशा से भारत अब उद्धार चाहता है
देशवासियों देश तुमसे अब ये उपकार चाहता है
समय के भीषण वज्रपात से भारत दहल रहा है
संस्कृति का यह उपहास अब उपचार चाहता है।।

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल

{ ६६७ } {Aug 2013}





जो भी पा न सका अब तक तुम्हे
उसको भी तेरा सौन्दर्य लुभाता है
फ़ूल चाहे किसी का भी हो मगर
उसकी गँध से सभी का नाता है।।

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल

Tuesday, August 20, 2013

{ ६६६ } {Aug 2013}





क्या ऐसा मोहिनी सोनल रूप कहीं आँखों ने है देखा
मनोरमा के नख-शिख का भूगोल रहा कैसे अनदेखा
रक्ताभ कपोल पर नारँगी धूप सम चहकती चितवन
कौन लिख पायेगा बोलो इस रूपमनी रूपसी का लेखा।।

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल

{ ६६५ } {Aug 2013}





मेरी वेदना मेरे शब्द, मेरे शब्द मेरे गीत हैं
खारजारी रहगुजर में, सँगरेज़े मेरे मीत हैं।

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल

{ ६६४ } {Aug 2013}





दर-दर भटक रही तरुणाई, पीत वसन ओढ़े-लहराये
भूखे पेट भटकता भारत, यौवन हाट-हाट बिक जाये
कान्ति-हीन हो गया मुखौटा, पीड़ा संगिनी बन आई
भावों का असफ़ल व्यापारी, कैसे गीत प्यार के गाये।।

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल

Saturday, August 17, 2013

{ ६६३ } {Aug 2013}





जिसमें हो प्यार वो नजर ढूँढ़्ते हो?
मरुथल में हरा-भरा शजर ढूँढ़्ते हो??

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल