दूषित दशा-दिशा से भारत अब उद्धार चाहता है
देशवासियों देश तुमसे अब ये उपकार चाहता है
समय के भीषण वज्रपात से भारत दहल रहा है
संस्कृति का यह उपहास अब उपचार चाहता है।।
क्या ऐसा मोहिनी सोनल रूप कहीं आँखों ने है देखा
मनोरमा के नख-शिख का भूगोल रहा कैसे अनदेखा
रक्ताभ कपोल पर नारँगी धूप सम चहकती चितवन
कौन लिख पायेगा बोलो इस रूपमनी रूपसी का लेखा।।
दर-दर भटक रही तरुणाई, पीत वसन ओढ़े-लहराये
भूखे पेट भटकता भारत, यौवन हाट-हाट बिक जाये
कान्ति-हीन हो गया मुखौटा, पीड़ा संगिनी बन आई
भावों का असफ़ल व्यापारी, कैसे गीत प्यार के गाये।।