गुनाहों को अपने घर प्रेम से बुलाती है मदिरा
फ़िर उनको अपना आशिक बनाती है मदिरा
मदिरा के इश्क में डूब, झूम के चलता गुनाह
तब गुनाहों की प्रियतमा कहलाती है मदिरा।।
अब नहीं होठों पर.. मुस्कानों का बसेरा है
रूठी ज़ुल्फ़ों की रातें, न आँखों में सबेरा है
पडने लगी है फ़ीकी.. आँखों की चमक भी
चँचल सी चितवन पर.. आ बसा अँधेरा है।।
उपवन का आँचल जगह-जगह से नुचा-नुचा
हर क्यारी को ढाँपे बेमौसम फ़ागुनी बहारे हैं
लज्जा ने स्वयं ढाँप लिया अपने नयनों को
लग गयी भँवरों की लम्बी-लम्बी कतारें हैं।।