Thursday, October 2, 2014

{ ७७१ } {May 2014}





उठता एक सवाल जेहन में बार-बार क्यों है
हर शख्स को होती प्यार की दरकार क्यों है
तनहाइयों में घबराया करता दिल हमारा भी
प्यार में ही मिलता सभी को करार क्यों है।।

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल

{ ७७० } {May 2014}





लगी दिल को चोट मिला ज़ख्म गहरा है
पर जमाना कहता कि इश्क अँधा-बहरा है।

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल

{ ७६९ } {May 2014}





ये कौन मन-उपवन से चुपके-चुपके गा रहा है
प्यार से तपते कपोल मन्द-मन्द सहला रहा है
मधुर. छुअन, मोहक. अँग - रँग, कोमल. अँग
प्रीति. चँदन. सुवासित. गँध. से महका. रहा है।।

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल

Wednesday, October 1, 2014

{ ७६८ } {May 2014}






अब भरोसा ही क्या यहाँ पर किसी का
आँसुओं से तर-बतर है चेहरा सभी का
बढ़ रही कुहू-निशा जमीं-आसमाँ पर
कालिमा नें ढ़ँक लिया रंग चाँदनी का।।

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल

{ ७६७ } {May 2014}






ये मन पँछी कहाँ जा कर करेगा बसेरा
जब नेह की डालियों के सहारे ही न हों।

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल

{ ७६६ } {May 2014}





देखता हूँ. जब तुमको. दिल को. सुकून. मिल. जाता है
मेरे गीतों को. गज़लों को. नया मजमून. मिल जाता है
तस्सवुर. में निहारता हूँ. जब भी. तेरे जमाले हुस्न को
बेचैनियों से भरे मेरे दिल को चैनो-जुनून मिल जाता है।।

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल

Tuesday, September 30, 2014

{ ७६५ } {May 2014}






दिल में तड़पती है आरजू अब तक
तेरी चाहत की है जुस्तजू अब तक
शामे-वस्ल को गुजरे जमाना बीता
मेरे जेहन में छाई है तू अब तक।।

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल