Friday, January 6, 2023

{९९५}



हर तरफ फैला हुआ है ऐसा काला साया 
कि अब अपने साये से भी डर लगने लगा। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 



मुसाफिर ही मुसाफिर हैं हर तरफ 
मगर हर शख्स तनहा जा रहा है। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 



लग जायेंगी अभी कई और सदियाँ 
इस दौर के इंसा को इंसा बनाने में। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल



कभी लाता नहीं ज़बाँ पर हालात का शिकवा 
बस खुद को सुपुर्दे-ग़म कर दिया करता हूँ। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल



बहुत  संगसार है  रास्ता  मेरे घर का  मानता  हूँ 
रख दूँगा हथेली पाँव के नीचे तुम आओ तो सही।

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

{९९४}



कुर्बानियाँ हमारी सब हैं भुला बैठे 
जुबां पे सबकी हमारी शैतानियाँ हैं। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 




हुस्न भी है उनका कातिल और अदा भी है कातिल 
हुस्न में शोख अदा भरकर वो खुद से झिझक रहे हैं। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 



ज़िन्दगी में जाने कैसा ठहराव आया 
कि खामोशियाँ भी दर्द से चीखती हैं। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 



अश्कों से जख्मों को धोकर आँखें ढूँढ़ती हैं 
ज़िन्दगी में क्या पाया है और क्या खोया है। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 



इश्क के महमहाते गुलशन को बेजार न कर
अपने ही नाखूनों से नया ज़ख्म तैयार न कर। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल

Wednesday, January 4, 2023

{९९३}



कभी आओ तो तुमको मैं दिखला दूँ 
मैंने किस शौक से अपने ग़म पाले हैं। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 




खुशियाँ कम  और  अरमान बहुत हैं 
गायब हो गयी हँसी, परेशान बहुत हैं 
सँभालों साहिल पे बने  रेत के महल 
समंदरों में उफनाते तूफ़ान बहुत हैं। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 




सुनो  जमाने  के  लोगों ये मेरे  दिल की आवाज है 
मोहब्बत छूट नहीं सकती, मेरा है वो मैं उसका हूँ।

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल  




कब तक देखेंगे हम ऐसे वहशी मंजर 
न इंसान बचे न इंसानियत बची कहीं। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Tuesday, January 3, 2023

{९९२}




मेरी तनहाइयों को क्या सहलाएंगें 
जब हो गए परायों से अपने लोग। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 




तनहा हूँ मैं, तनहा हैं राहें भी, साथ तनहाइयों से रहा अपना 
खो गया इस कदर जमाने में, पूछता रहा सबसे पता अपना। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 




जीस्त  की आह  में, मौत  की  पनाह  में 
जुर्म चमन पर हुए, बागबाँ की निगाह में। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 




श्रद्धा और विश्वास तुम जतलाओगे कैसे 
सजदे में गर सर को झुकाना नहीं आता। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 




ख्वाब कभी लगते हैं परिंदों की मानिन्द 
यही ख्वाब कभी-कभी सैय्याद लगते हैं। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Wednesday, December 28, 2022

{९९१}




बिन पलक झपके चकोरी सी तकती है मुझे 
अपनी पलकों पर मुझे अब सजा भी ले तू। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 




थरथराते होंठ मेरे न कुछ कहें न ही कह पायें 
बस सह लेता हूँ जो मिलती अपनों से वेदनाएं। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 




अब मेरा अपनापन भी फरेब लगता तुम्हें 
कुछ तो प्यार को समझो कि ज़िन्दगी कटे। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 




तेरी उलफ़त ने मुझको बस ग़म ही ग़म दिए 
तुझसे दिल लगाने का ये अच्छा इनाम पाया है। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 




मुझसे बेवजह पूछते हो तुम वफ़ा के मायने 
मैं तो तुम्हें हाथों की लकीरों में बसा चुका हूँ। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Tuesday, December 27, 2022

{९९०}




सिलसिला दर्दों-ग़म का ही जारी है 
जीस्त की चुकता हो रही उधारी है। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 





शकों-शुबहा की रेत के आशियाने कब टिकते हैं 
किसी दिल में प्यार का घर बनाओ तो अच्छा है। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 




मोहब्बत का असर आज होता क्यों नहीं 
शायद चाँदनी के बीच बदली आ गई है। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 





चाँद जाने कहाँ कैसे खो गया 
चाँदनी को ही हम तरसते रहे। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 



Thursday, December 8, 2022

{९८९}




लोग भी क्या से क्या न जाने हो गये 
कल तक जो अपने थे बेगाने हो गये। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 





तुझसे मिलता हूँ तो खामोश सा हो जाता हूँ 
पर ऐ ज़िन्दगी तुझसे सवालात कई करने हैं। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 





कुछ न कह कर सब कहा तुमसे 
न रही कोई गिला-शिकवा तुमसे 
शायद लकीरों की कोई साजिश है 
जो रख रही है मुझको जुदा तुमसे।। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 





जिनकी बन्दूकें चलें दूसरों के काँधों से 
उनकी खुद लड़ने की औकात नहीं होती। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 





हयाते-मोहब्बत शायद मुझसे रूठ गई है 
ज़िन्दगी की खामोशीयाँ अब सिमटती नहीं। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल