Monday, May 7, 2012

{ २५३ } {May 2012}




प्यार की रूह छटपटाती है
गीत की आस लडखडाती है
बदहवास सी इन हवाओं में
चिरागों की लौ थरथराती है।।

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल

{ २५२ } {May 2012}





बन्द हो गईं पलकें, लगी देखने अपना मन
स्वासों से उभरते नये स्वर, गीत नव-नूतन
भावनायें अनुभूतियों का कर रही नीराजन
चेह से देह मिली मन-चेतना कर रही नर्तन।।

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल

{ २५१ } {May 2012}




अपने केशों की छाँव में दो पल
मुझको ऐसे ही गुजार लेने दो
चला जाऊँगा बस मुझे केवल
अपनी कविता सँवार लेने दो।।

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल



{ २५० } {May 2012}




शील, धर्म-रक्षक, प्रचन्ड संकल्पवान हैं जो
वीर अस्त्र-शस्त्र धारी परशुराम महान हैं वो
धीर-वीर मनुज हो कर भी इस धरातल पर
पुरुषोत्त्म, क्षमादानी देवता के समान हैं वो।।

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल

{ २४९ } {May 2012}




गमे - हिज्र इन आँखों से बयाँ है
कब हो गई सुबह, शाम कहाँ है
कुछ तो समझो मौसम के इशारे
हसीन है चाँद और रात जवाँ है।।

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल

{ २४८ } {May 2012}




कितनी ही कलियाँ उपवन में
सुरभित हो-हो कर मुरझातीं
कितनी ही सुधियाँ जीवन में
बनती हैं बन कर मिट जातीं।।

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल

Thursday, May 3, 2012

{ २४७ } {May 2012}





पर्वत पर बहते झरनों को इन सूखे मैदानों में आ जाने दो
खारे सागर में घुलने से पहले बादल बन प्यास बुझाने दो
कैसे सुनी - अनसुनी कर दूँ इन प्यासी, वीरान पुकारों की
मझधारों से कटती लहरों को तट पर जा कर खो जाने दो।।

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल