बन्द हो गईं पलकें, लगी देखने अपना मन
स्वासों से उभरते नये स्वर, गीत नव-नूतन
भावनायें अनुभूतियों का कर रही नीराजन
चेह से देह मिली मन-चेतना कर रही नर्तन।।
शील, धर्म-रक्षक, प्रचन्ड संकल्पवान हैं जो
वीर अस्त्र-शस्त्र धारी परशुराम महान हैं वो
धीर-वीर मनुज हो कर भी इस धरातल पर
पुरुषोत्त्म, क्षमादानी देवता के समान हैं वो।।
पर्वत पर बहते झरनों को इन सूखे मैदानों में आ जाने दो
खारे सागर में घुलने से पहले बादल बन प्यास बुझाने दो
कैसे सुनी - अनसुनी कर दूँ इन प्यासी, वीरान पुकारों की
मझधारों से कटती लहरों को तट पर जा कर खो जाने दो।।