Saturday, December 22, 2012

{ ४२० } {Dec 2012}




पुष्पों का भी सानिध्य मिलेगा
पहले काँटों पर तो हम सो लें
निच्छल प्रेम युग की गंगा है
हम सारे पाप सहज ही धो लें।।

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल

{ ४१९ } {Dec 2012}





तुम फ़ूल बन कर मुस्कुराये बाग में
ध्वनि तुम्हारी मिली राग-विराग में
तुम मिले कभी नभ में, कभी थल में
कभी बहते पानी और कभी आग में।।

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल

{ ४१८ } {Dec 2012}





प्रश्नों के जाल हो गये हैं हम
कितने बेहाल हो गये हैं हम
दर्द की मिसाल हो गये हम
बेहया सवाल हो गये हैं हम।।

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल

{ ४१७ } {Dec 2012}





कोई नही जो दिल की धडकन मन की आशा समझे
मैने पर्वत जिनको बनाया, मुझको वो माशा समझे
हर महफ़िल में खुशियाँ दी है मैंने इस दुनिया को
पर मुझको दुनिया वाले केवल एक तमाशा समझे।।

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल

{ ४१६ } {Dec 2012}





हर दिशा के हाथ में पत्थर सजे हैं छोटे बडे
एक सुन्दर काँच का घर है हमारी ज़िन्दगी
हो रहा सिन्धु-मंथन, है कहाँ अमृत घडा
देव-असुरों का समर है अब हमारी ज़िन्दगी।।

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल

{ ४१५ } {Dec 2012}





अपनी इन अदाओं को तुम अब समेट लो
हो जायेगी वरना शहर की हवा भी पागल।।

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल

{ ४१४ } {Dec 2012}





मयकदे से इस दिल को कोई गिला नही इसलिये
चलो आज फ़िर साकी से इश्क का इजहार करते हैं।।

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल