पल्लव
Saturday, April 11, 2015
{ ८८६ } {March 2015}
एक तितली उडी हुआ फ़ूल बेचैन है
पाँखुरी-पाँखुरी हो कट रही अब रैन है
घायल हुआ है जब से रूप का मौसम
मछली बिन ताल भी हो गया बेचैन है।।
-- गोपाल कृष्ण शुक्ल
{ ८८५ } {March 2015}
गर ज़ख्म भर जायेंगें तो फ़िर किसे याद करेंगे हम
इन टीस भरे रिसते हुए ज़ख्मों को हरा ही रहने दो।
-- गोपाल कृष्ण शुक्ल
{ ८८४ } {March 2015}
तकिये पर सपने आज भी सोए होंगें
हँसने के पहले वो जी भरकर रोए होंगे
क्यों नींदों की अँखियों से दूरी हो गयी
तुमने भी शायद कुछ काँटे बोए होंगें।।
-- गोपाल कृष्ण शुक्ल
{ ८८३ } {March 2015}
अब डर लगता है अपनी आँखों में सपनों को सजाने से
वो जालिम कहीं मेरे हसीं ख्वाबों को चूर-चूर न कर दे।
-- गोपाल कृष्ण शुक्ल
{ ८८२ } {March 2015}
क्यों नाराज है जालिम अब तू मुझसे
तुझे चाहा है कोई गुनाह तो नहीं किया।
-- गोपाल कृष्ण शुक्ल
Friday, April 10, 2015
{८८१} {Feb 2015}
उस हमनशीं की याद में शबोरोज़ ये आँखें बरसती हैं
पर वो ज़ालिम न ही मुझे याद करता न पास बुलाता है।
-- गोपाल कृष्ण शुक्ल
{८८०} {Feb 2015}
जेहन में उनके मेरे जज़्बातों की कदर अब बची नहीं
इलज़ाम लगाना जब से उनकी फ़ितरत हो गयी है।
-- गोपाल कृष्ण शुक्ल
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