पल्लव
Saturday, October 8, 2011
{ १८ } { October 2011 }
मुस्कुराओ कि फ़िर ज़िन्दगी लौटे
इस रेत के शहर में कुछ नमी लौटे।।
-- गोपाल कृष्ण शुक्ल
{ १७ } { October 2011 }
काँटों से भरे हुए चमन की बहार क्या करेंगे,
बेदर्द है जो इन्सान उससे करार क्या करेंगे,
खुदगर्ज है जो उसका इन्तजार क्या करेंगे,
मगरूर है जो खुद मे उससे प्यार क्या करेंगे।।
-- गोपाल कृष्ण शुक्ल
{ १६ } { October 2011 }
बनाया जिसे हमने गुलशन का माली
उसी ने नोच दिये हैं ये गुल चमन के
परेशान है जमीं देख के अम्बर खफ़ा है
क्यों न बागी बने, हम हैं घायल मन के।।
-- गोपाल कृष्ण शुक्ल
{ १५ } { October 2011 }
चाहे वंशी हो या चाहे हो रणभेरी
मन दोनो स्वर को छुआ करता
कर्क बस इतना है कि दोनो का
अपना-अपना समय हुआ करता।।
-- गोपाल कृष्ण शुक्ल
{ १४ } { October 2011 }
बिन बोले शब्दों के तीरों से
कितने लोग आहत होते है
हमने ही तो काँच बिखेरे है
अब चुभने पर क्यो रोते है।।
-- गोपाल कृष्ण शुक्ल
{ १३ } { October 2011 }
दुनिया नें जाने क्यों मुझसे मिलना-जुलना छोड दिया,
क्या करता, मैने भी अपना गुलजार मरहला छोड दिया।।
-- गोपाल कृष्ण शुक्ल
Friday, October 7, 2011
{ १२ } { October 2011 }
बाढ पर जब भी शबाब होता है
चढता हुआ सा माहताब होता है
उनके नयन क्यों नही कटीले हों
जिनका चेहरा ही गुलाब होता है।।
-- गोपाल कृष्ण शुक्ल
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