Friday, February 10, 2012

{ १४५ }





सुर-सप्तकों से अलग एक स्वर हो
मौन रहती हो जहाँ में, पर मुखर हो
जानता हूँ बिन्दु में न ठहराव तेरा
सिन्धु की हर लहर में एक लहर हो ।।

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल

Saturday, January 21, 2012

{ १४४ } {Jan 2012}





खुश हो तुम महफ़िल में रहने लग गई हो
अपने हुनर से कुछ ऐब करने लग गई हो
अब कोई नही कह सकता तुमको कातिल
जब मुस्कुराकर कत्ल करने लग गई हो ।।

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल

{ १४३ } {Jan 2012}






अँदाजे-बयाँ आपका बदला तो यूँ लगा
हम बात कर रहे थे अभी तक नकाब से
किसी दिल में किस तरह कोई जगह करे
यह राज अब पूछना है किसी कामयाब से ।।

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल

{ १४२ } {Jan 2012}






राह है काँटों की पाँव बँधन में
ज़िन्दगी है अजीब उलझन में
मेरी ज़िन्दगी में तुम हो जैसे
चाँदनी चहके बबूल के वन में ।।

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल

{ १४१ } {Jan 2012}





मुस्कुराते रहे हैं हम रोते हुए
तेरी नजर के सामने होते हुए
आज फ़िर से रात पकडी गई
तेरी उलझी ज़ुल्फ़ों में सोते हुए ।।

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल

Friday, January 13, 2012

{ १४० } {Jan 2012}







हुई थी कल उनसे मुद्दतों में मुलाकात
खामोश अदाओं से ललचाते जज्बात
उनके नग्मों मे ही सो गई रात चाँदनी
भुलाए न भूले वो खुश्बू में डूबे लम्हात ।।

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल

{ १३९ } {Jan 2012}






मोहब्बत अब राज रही नही, दिन बीत गये
ऐ यादे-शबाब ! तेरे वो दिन अब बीत गये
मगर उसके हुस्न के तेवर कहते हैं अब भी
हार जाये जो इश्क मे, समझो वो जीत गये ।।

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल