जाने कहाँ गया वो जालिम तन्हाई का जहर पिला
हमदम की पा कर एक झलक मन का तार हिला
कैसे बीत गये दिन बचपन के सपने बुनते-बुनते
दिल के तपते सहरा में खुश यादों का फ़ूल खिला।।
तुम बिन सब सूना-सूना, लफ़्ज़ भी हैं बिखरे-बिखरे
लाओ कोई प्यार का मरहम, जख्म भी हैं उभरे-उभरे
तेरे प्यार की मधुर धुन को, हम कब से तरस रहे हैं
मधुर गीत बना उनको, जो पल साथ-साथ हैं गुजरे।।
मँजिलें भी ले रहीं हैं अब गजब का इम्तिहाँ
बेल-बूटे-शजर भी न छोडे रास्ते के दर्मियाँ
दिलों के राज भी अब कैद सी महसूस करते
खनक रही हैं इस लिये लबों की खामोंशियाँ।।