Saturday, February 11, 2012

{ १५१ } {Feb 2012}





खाली-खाली जेब कहे, ये कैसा गणतंत्र है
अन्न को तरसते पेट, ये कैसा गणतंत्र है
गुम है दिल की मस्ती, ये कैसा गणतंत्र है
धन्य-धन्य भ्रष्टतंत्र, ये कैसा गणतंत्र है ।।

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल

Friday, February 10, 2012

{ १५० } {Feb 2012}





प्रीति में जब से रमा है, दिव्य मेरा मन
देह यह माटी की महकती, हो गई चंदन
मुँद गईं पलकें देखने लगी कुछ मन में
भावना अनुभूतियों का कर रही वन्दन ।।

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल

{ १४९ } {Feb 2012}





नजर आता हूँ जैसा नहीं हूँ मै वैसा
जैसा समझते मुझे नहीं हूँ मै वैसा
खुद अपने से ऐब अपने छुपाता हूँ
मुझको खुद नही मालूम हूँ मै कैसा ।।

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल


{ १४८ } {Feb 2012}





नेता जी सुभाष चन्द्र बोस की जन्ती पर शत-शत नमन

थर-थर करती धरती सारी
टूट-टूट कर गिरते थे तारे
तडप उठती लहरें सागर की
हिम पर्वत भी डगमग डोले
सूरज भूले बरसाना अंगारे
ऐसी थी हुँकर सुभाष की
दुश्मन ढूँढे गली-गलियारे ।।

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल


{१४७ } {Feb 2012}





ज़िन्दगी में आकर रंग भर दो तुम
इस ज़िन्दगी का हर वरक सादा है
आकर मुझको कुछ तो प्यार दे दो
मेरा दामन-ए-दिल बहुत कुशादा है ।।

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल

{ १४६ } {Feb 2012}





यह जीवन प्यासा पनघट है
आकुल तृष्णा की लहरों का
अन्तर मे इसके जमघट है
यह जीवन प्यासा पनघट है ।।

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल

{ १४५ }





सुर-सप्तकों से अलग एक स्वर हो
मौन रहती हो जहाँ में, पर मुखर हो
जानता हूँ बिन्दु में न ठहराव तेरा
सिन्धु की हर लहर में एक लहर हो ।।

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल