Friday, August 17, 2012

{ ३११ } {Aug 2012}





कुछ तो हो अब ऐसा कि जीने की चाह निकले
कहीं से तो बेपनाह मोहब्बत की राह निकले
इतनी बडी है कायनात, इतना बडा जमाना
शिकस्ता-दिलों का कोई तो खैरख्वाह निकले।।

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल

{ ३१० } {Aug 2012}





लबों पर शिकवे-गिले सजाते रहे हम
तुम्हारी वफ़ाओं को सहलाते रहे हम
यकीनों की कश्ती भँवर में फ़ँस गई
इसलिये दरिया में डगमगाते रहे हम।।

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल

{ ३०९ } {Aug 2012}





मुस्कुराओ कि फिर जिन्दगी लौटे
इस रेत के शहर में कुछ नमी लौटे
बुझ गई आँख, सों गई दहलीज है
डुबो इश्क में फिर जिन्दगी लौटे||

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल

{ ३०८ } {Aug 2012}





समझ आता नहीं सवाल तेरे बेवफा होने का
दिखता नहीं जवाज दिल-शिकस्ता होने का
फिर सोचता हूँ कि तुझे पाया ही कब था मैंने
जो हो मेरे दिल में एहसास तुझे खो देने का||

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल


जवाज = कारण


{ ३०७ } {Aug 2012}





प्यार की रूह में गजल की तरह
रूप की झील में कमल की तरह
तुम जो होते हो साथ, दिन मेरा
बीत जाता है एक पल की तरह||

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल

{ ३०६ } {Aug 2012}





दर्द के अंजुमन से लाया हूँ
गम के गुलशन से लाया हूँ
एक मुस्कान आपके खातिर
आँसुओं के वतन से लाया हूँ||

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल

{ ३०५ } {Aug 2012}





चौदहवीं के चाँद की चाँदनी जब आती
आकर दिल के सुखद दर्द को सहलाती
सावन कि रातों में मेघों की रिमझिम
अंदर-बाहर, तपन-जलन भर जाति||

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल