हिन्द की सेवा से मतलब था उसी से काम था
उसी धुन मे मगन, हर वक्त, सुबहो-शाम था
मैदाने सियासत का था मर्द कभी डरता न था
संसार में गूँजता "शेरे-हिन्द" उसका नाम था।।
ज़िन्दगी के वास्ते कुछ ख्वाहिशें तो थीं मगर
रेत का दरिया हमारे ख्वाबों में शामिल न था
डूब ही गया होता अगर जरा घबरा गया होता
मैं था वहाँ दूर तक दिखता जहाँ साहिल न था।।
बह उठी दरिया की मौंजें, आँख में उफ़ना समन्दर
कुछ आँसू बह चले हैं, कुछ ठहरे पलकों के अन्दर
हो गये हो तुम दूर जब से छाया भी न पा सके हम
साथ अश्कों ने दिया तब हर डगर हर रहगुजर पर।।