औरों की बात छोडिये यहाँ अपने ही अपने नही हुए
क्या नाम दूँ उन्हे जो सबके हुए, पर अपने नही हुए
शायद मेरे बुरे वक्त का ही सुबूत है जो दे रहे हैं वो
हैरत यही कसौटी पर परखते रहे पर अपने नही हुए।।
राह जीवन की कठिन खारजारों से भरी है
दुख-दर्द की डालियाँ भी अभी तक हरी हैं
बन के लौ दिये की तमस से मैं लड रहा हूँ
अँधड-आँधियाँ-अँधेरों की लगी सरसरी है।।
मेरे अधरों की पगडंडी, कभी चरण हँसी के चूम न पाई
मेरी मादकता मादक बनकर अपने मद में झूम न पाई
फ़ट जात उर मुखर वेदना से जब आँसू का उपहार मिले
श्वासों की उर्मि शैय्या पर जब न मुझको प्यार मिले।।