पल्लव
Sunday, November 4, 2012
{ ३९२ } {Nov 2012}
कटती शाख पर परिंदों का डेरा हो
बीते सिर्फ़ आधी रात औ’ सबेरा हो
हादसों का अजीब सा मंजर होगा
जो जलते चिरागों के नीचे अँधेरा हो।।
-- गोपाल कृष्ण शुक्ल
{ ३९१ } {Nov 2012}
इरादे थे क्या-क्या और क्या कर चले
हम खुद से खुद ही को जुदा कर चले
रह न गयी जिनसे रहबरी की उम्मीद
उसी बेवफ़ा से ही हम वफ़ा कर चले।।
-- गोपाल कृष्ण शुक्ल
Saturday, November 3, 2012
{ ३९० } {Nov 2012}
तसव्वुर में वो ही नक्श उभर आया है
अब्र-ए-बाराँ में एक चाँद नजर आया है
दरिया की लहरों पे थिरके अक्स उसका
हर जगह उसका ही नूर नजर आया है।।
-- गोपाल कृष्ण शुक्ल
{ ३८९ } {Nov 2012}
आग सी जल रही है दिन-रात आँखों में
तडपते हुए गुजरती है हर रात आँखों में
सुकूँ के दो-चार पल मिल जायें दिल को
थम जाये आँसुओं की बरसात आँखों में।।
-- गोपाल कृष्ण शुक्ल
{ ३८८ } {Nov 2012}
जाने कहाँ गईं रूठ कर वो चाँदनी रातें
वो रँगीन बहारें, वो मोहब्बत की रातें
गर होती रही ऐसी साजिशों पे साजिशें
कैसे बनेगी हकीकत ये ख्वाबों की रातें।।
-- गोपाल कृष्ण शुक्ल
{ ३८७ } {Nov 2012}
मैंने जो महसूस किया तन्हाई में
साँस-साँस झलक रहा है मेरा दर्द
भटके बचपन अब भी गलियों में
जाने क्यूँ हुआ दिल आवारा-गर्द।।
-- गोपाल कृष्ण शुक्ल
Friday, November 2, 2012
{ ३८६ } {Nov 2012}
कर दे कुर्बान अपनी खुशियाँ किसी की खातिर
ख्वाहिश करे अपनी खुशियाँ किसी की खातिर
जहाँ में ऐसे हमसफ़र अब बहुत कम मिलते हैं
कयामत तक दे जाये जो साथ किसी की खातिर।।
-- गोपाल कृष्ण शुक्ल
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