Tuesday, January 3, 2023

{९९२}




मेरी तनहाइयों को क्या सहलाएंगें 
जब हो गए परायों से अपने लोग। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 




तनहा हूँ मैं, तनहा हैं राहें भी, साथ तनहाइयों से रहा अपना 
खो गया इस कदर जमाने में, पूछता रहा सबसे पता अपना। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 




जीस्त  की आह  में, मौत  की  पनाह  में 
जुर्म चमन पर हुए, बागबाँ की निगाह में। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 




श्रद्धा और विश्वास तुम जतलाओगे कैसे 
सजदे में गर सर को झुकाना नहीं आता। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 




ख्वाब कभी लगते हैं परिंदों की मानिन्द 
यही ख्वाब कभी-कभी सैय्याद लगते हैं। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Wednesday, December 28, 2022

{९९१}




बिन पलक झपके चकोरी सी तकती है मुझे 
अपनी पलकों पर मुझे अब सजा भी ले तू। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 




थरथराते होंठ मेरे न कुछ कहें न ही कह पायें 
बस सह लेता हूँ जो मिलती अपनों से वेदनाएं। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 




अब मेरा अपनापन भी फरेब लगता तुम्हें 
कुछ तो प्यार को समझो कि ज़िन्दगी कटे। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 




तेरी उलफ़त ने मुझको बस ग़म ही ग़म दिए 
तुझसे दिल लगाने का ये अच्छा इनाम पाया है। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 




मुझसे बेवजह पूछते हो तुम वफ़ा के मायने 
मैं तो तुम्हें हाथों की लकीरों में बसा चुका हूँ। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Tuesday, December 27, 2022

{९९०}




सिलसिला दर्दों-ग़म का ही जारी है 
जीस्त की चुकता हो रही उधारी है। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 





शकों-शुबहा की रेत के आशियाने कब टिकते हैं 
किसी दिल में प्यार का घर बनाओ तो अच्छा है। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 




मोहब्बत का असर आज होता क्यों नहीं 
शायद चाँदनी के बीच बदली आ गई है। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 





चाँद जाने कहाँ कैसे खो गया 
चाँदनी को ही हम तरसते रहे। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 



Thursday, December 8, 2022

{९८९}




लोग भी क्या से क्या न जाने हो गये 
कल तक जो अपने थे बेगाने हो गये। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 





तुझसे मिलता हूँ तो खामोश सा हो जाता हूँ 
पर ऐ ज़िन्दगी तुझसे सवालात कई करने हैं। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 





कुछ न कह कर सब कहा तुमसे 
न रही कोई गिला-शिकवा तुमसे 
शायद लकीरों की कोई साजिश है 
जो रख रही है मुझको जुदा तुमसे।। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 





जिनकी बन्दूकें चलें दूसरों के काँधों से 
उनकी खुद लड़ने की औकात नहीं होती। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 





हयाते-मोहब्बत शायद मुझसे रूठ गई है 
ज़िन्दगी की खामोशीयाँ अब सिमटती नहीं। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Monday, December 5, 2022

{९८८ }




ये  खून रिस  रहा है  ज़ख्मे-नज़र का 
जाने क्यों दुनिया इसे अश्क कहती है। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 





याद कर उस भूली-बिसरी याद को 
हमने सोए हुए ज़ख्म को जगाया है। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 





संगे-राह उनकी रहगुजर से हमेशा हटाता रहा हूँ 
शिकायतें मेरे हम-राहियों को फिर भी है मुझसे। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल


 


न ही पूजा हूँ, न ही बन्दगी हूँ मैं 
जी भर जी लो मुझे ज़िन्दगी हूँ मैं। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 





शतरंज की बिसात पर रखी है ज़िन्दगी 
मोहरा बन के रह गया हर आदमी यहाँ। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 





रह न सकूँ साकी मैं होश में 
कोई जाम ऐसा पिला दे तू। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल


 


मोहब्बत में मुकद्दर ने हमें यही सौगातें दी हैं 
ज़िन्दगी सजा, साँसें कफ़स के मानिन्द हो गईं। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Thursday, November 24, 2022

{९८७ }




मुस्कुराहटों के लिये ये लब तरस गये 
अब खामोशीयाँ ही दर्द से कराहती हैं। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 




ज़िन्दगी ने अनगिनत घाव दिये दिल को 
वक्त गुजरा पर लहू अभी भी बह रहा। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 




न करो कोशिश मुझ जैसी 
बासी लकीर को हटाने की 
मैं उतना ही याद आऊँगा 
मुझे जितना तुम मिटाओगे। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 




बाँध देती है उम्र मस्ती को सीमाओं में 
काश कि उम्र बचपन में ही ठहर जाती। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 




कुछ हँसीं लम्हे चुरा लेने को जी चाहता है 
तुमसे तुम्हीं को चुरा लेने को जी चाहता है। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 




अपनों मे हो गया जब गैर हूँ तब गैरों की क्या दरकार 
अपनों को अपनों कि न जरूरत न अपनों से सरोकार। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

Tuesday, November 22, 2022

{९८६ }




मैं हूँ एक ठहरी हुई खामोशी जिसकी कोई आवाज नहीं 
मैं वो अफ़साना जिसका कोई अंजाम नहीं, आगाज़ नहीं 
जर्जर पिंजर सँग अब बैठा हूँ टूटती साँसों का हुजूम लिए 
पस्त हो गये हौसले सारे अब बची कूवते - परवाज़ नहीं।। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 





बिछी रह गईं मेरी आँखें पर तुम नहीं आये 
यादों में ही खो गईं यादें पर तुम नहीं आये 
टुकड़े-टुकड़े हो कर अब चुभ रही सीने में 
नम हुईं यादों की आँखें पर तुम नहीं आये।। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 





दरिया तो चाहता है कि बुझा दे सबकी प्यास 
मगर कोई प्यासा पास उसके आए तो सही। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 





वो बुलंदियाँ भी किस काम की जनाब 
इंसान चढ़े और इंसानियत उतर जाये। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 





तुम को अपनी आँखों में तस्वीर की तरह मैं भी सजा लूँ 
दिल में धड़कन की तरह तुम भी मुझे बसाओ तो सही। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 





अब कर लिया है तीरगी से समझौता 
खयाल छोड़ दिया चराग जलाने का। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल