Monday, December 5, 2022

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ये  खून रिस  रहा है  ज़ख्मे-नज़र का 
जाने क्यों दुनिया इसे अश्क कहती है। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 





याद कर उस भूली-बिसरी याद को 
हमने सोए हुए ज़ख्म को जगाया है। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 





संगे-राह उनकी रहगुजर से हमेशा हटाता रहा हूँ 
शिकायतें मेरे हम-राहियों को फिर भी है मुझसे। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल


 


न ही पूजा हूँ, न ही बन्दगी हूँ मैं 
जी भर जी लो मुझे ज़िन्दगी हूँ मैं। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 





शतरंज की बिसात पर रखी है ज़िन्दगी 
मोहरा बन के रह गया हर आदमी यहाँ। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 





रह न सकूँ साकी मैं होश में 
कोई जाम ऐसा पिला दे तू। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल


 


मोहब्बत में मुकद्दर ने हमें यही सौगातें दी हैं 
ज़िन्दगी सजा, साँसें कफ़स के मानिन्द हो गईं। 

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल 

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