Tuesday, April 3, 2012

{ २२७ } {April 2012}





फ़ागुनी बयार भोर बन गई सहसा
बसी थी जो मुझमे साँझ सावन की
तुमने कुछ इस तरह छुआ मुझको
ऋतु ही बदल गई मेरे मन-दर्पन की।।

-- गोपाल कृष्ण शुक्ल

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